मेरा ई पन्ना

इस ब्लॉग का उद्देश्य अभिव्यक्ति है । यहाँ प्रस्तुत विचार मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण से है । इसे पढने वाले असहमति एवम सहमति दर्ज करने के लिए न केवल स्वतंत्र है, वरन आमंत्रित भी है

रविवार, मई 06, 2007

चिट्ठाचर्चा मे बदलाव की गुंजाइश

आज कई दिनो बाद कमप्युटर बाबा के चोखटे के दर्शन किये है ओर क्या देखते है कि कल दो – दो चिट्ठाचर्चा छपि है । लगा शायद कुछ नया होगा । पर क्या देखते है की वही पुरानी इस्टाईल की चिट्ठाचर्चा -- कुछ चुन्निदा चिट्ठो के नाम ओर उनके बार में एक दो मजाक भरी लाईने लिख दी गई है । अगर चर्चा का मतलब यही है तो कोई पुरालेख क्यो न देखे कम स कम वहाँ पर उन चिट्ठो के बारे मे कुछ तो विस्तार से पढ सकते है। वैसे चिट्ठाचर्चा क्यो करते है कोई बताने का कष्ट करेगा । कैसा रहे अगर एक दिन के चिट्ठो को तीन या फिर चार भागो मे बाँट दिया जाये ओर फिर तीन चार चिट्ठाकारो से उनकी चर्चा थोडी विस्तार से करवाई जाये जिससे चिट्ठाचर्चा को पढने के बाद पता तो लगे की उस चिट्ठे में लिखा क्या है। यह सिर्फ एक विचार है पता नही इस पर कहाँ तक इस पर अमल किया जा सकता है। बाकी चिट्ठाचर्चा के मालिको की मर्जी।

शनिवार, अप्रैल 28, 2007

नारद में हमारी आस्था ----- मोहल्ला विवाद - प्रकरण

ना मै किसी का गाईड हूँ ओर न ही कोई फिलोस्फर बस ये जो पलायन नुमा पोस्ट लिखने का दौर सा चला है उसके ऊपर अपने विचार व्यक्त करने की कोशिश कर रहा हू।
गाँधी जी को माध्यम बनाया गया है तो सोचता हूँ उनसे ही शुरुआत की जाए। मुझे यह लगता है कि गाँधी जी ने शायद ही कभी यह सोचा हो कि देश को उन्होने अज़ाद कराया है{यही उनका बडप्पन था} क्योंकि देश को तो आज़ाद होना ही था ;स्थितियाँ ही ऐसी बन चुकी थी । गाँधी जी तो उसके सिर्फ एक माध्यम थे {यह उनके योगदान को नकारना नही है} अगर गाँधी ना होते तो कोई और होता । इसी तरह अगर कुछ लोग यह सोचते हैं कि हिन्दी चिट्ठाकारी उनके दम से है और उनके चिट्ठा जगत छोडते ही इसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा तो यह भ्रामक है। (इसका मतलब यह कतई न निकाला जाए कि हम किसी के जाने से खुश हैं )

मुझे परेशानी इस बात की है कि नारद – मोहल्ला –विवाद – प्रकरण में कुछ ऐसी बातें सामने आईं जिनसे नारद के आंतरिक व्यवस्थापन मे धूर्तता के कई उदाहरण दिखाई दिए
जो कि किसी भी सूरत में समर्थित नही हो सकतीं । कई लोग इस बात को कई बार रेखांकित कर चुके हैं कि नारद सिर्फ एक फीड एग्रीग्रेटर है, उसे यह स्मरण रखना चाहिए ;हमें भी। वह शासन कर्ता नही है जिसे शासन की कुटिलताओं का उपयोग अपने राज्य को चलाने के लिए करना चाहिए।
सृजन लिखते हैं --
......
“लेकिन भारतीय संविधान और क़ानून के हिसाब से चूंकि अविनाश का उक्त बयान एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी का था, इसलिए उसपर आपत्ति जताना और उसका विरोध करना मैंने अपना नागरिक कर्तव्य समझा। इस संबंध में मैंने सबसे पहले अनूप दा से बात की। उन्होंने मुझे समझाया कि मुकदमा मत करो या कराओ, उससे नारद के जरिए निपटते हैं।“
अरे भाई आप अच्छे नागरिक होने का सबुत ओर बहुत त्तरीको से दे सकते हैं । जैसे कि को फ्री कानुनी पोरटल चला कर ।
खैर इस सारे विवाद का हमे बडा फायदा हुआ । कम से कम नारद किस तरह का नजरीया रखता उन ब्लोगस के लिए जो अगर लीक से हट कर चले ....
जीतू को कहकर मोहल्ले की रेटिंग कम करा देते हैं और मोहल्ले की कोई पोस्ट नारद के पहले पन्ने पर नहीं आएगी।
अगर यह सारा विवाद न होता तो सृजन जी के ज़रिये इस रवैये का तो खुलासा होता ही नही।
और यही पर बीज है नारद के नए डिस्क्लेमर के सर्जन का भी , जिसके बारे मे संशय मसिजीवी ज़ाहिर कर चुके हैं ....
“जीतू से भी इस संबंध में चर्चा हुई और मैंने क़ानूनी प्रावधानों को उद्धृत करके उन्हें समझाया कि नारद को मोहल्ले पर रखना क़ानूनी दृष्टि से उपयुक्त नहीं है, क्योंकि वह भी मुकदमे के दायरे में आएगा। उसके बाद नारद पर उन्होंने एक डिस्क्लेमर लगाया, जिसके बारे में मसिजीवी जी ने अपनी पोस्ट में विस्तार से उल्लेख किया है। “
ओर हर काम की तरह नारद ने इस काम को भी बडी तीव्रता के साथ अंजाम तक पहुचाया ........
“नारद ने मोहल्ले की रेटिंग 1 से घटाकर 2 कर दी ताकि उसकी पोस्टें पहले पन्ने पर अधिक देर नहीं टिके। ......” ......जीतू भाई से पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं क्या कर सकता हूं, रेटिंग कम कर दी है, “
भईया कुछ भी कहो हम तो यह सब पढ कर बहुत ही आहत हुए । इससे नारद का रेटिंग वाला सारा मामला हमारे प्रश्नों से घिर गया है । मेरी पोस्ट के साथ भी यह हो सकता है। हम मे से कोई भी जो नारद के व्यवस्थापकों से पंगा लेगा उसे दूसरे पन्ने पर पटक दिया जाएगा, रेटिंग कम हो जाएगी।
यह सब दुखद है । नारद के प्रति हमारी आस्था ध्वस्त हुई है । यह काम मुश्किल है जो नारद करता आया है पर वक़्त यह भी आ गया है कि हम इसके संस्थानीकरण मे पैदा हो गए सत्तात्मक रवैये से सीख लें । ब्लॉगरो के विवाद मे पडना फीड एग्रीग्रेटर के लिय ऐसी ही असुविधा व अप्रिय स्थितियाँ पैदा करेगा। व्यवस्थापकीय हित में निर्णय लेना बिलकुल नारद के अख्तियार में है लेकिन पक्ष लेना कदापि नही । इम्पर्सनल होकर चलने से ही उसकी गरिमा है ।
मैने सिमोन के स्त्री चिंतन पर शुरुआत की थी । देखता बहुत बार रहा हूँ नारद पर ,लिखना अभी शुरु किया है । लेकिन विवाद –प्रकरण ने यह सब लिखने पर विवश कर दिया ।
डिसक्लेमर--------
किसी को आहत करना कतई उद्देश्य नही है।
यह मेरे विचार हैं ।
पसंद ना आने पर कृप्या रेटिंग कम कर के दूसरे पन्ने पर न फेंका जाए ।

गुरुवार, अप्रैल 26, 2007

नियति - सिमोन -दूसरी कडी

स्त्री की जैविक स्थिति क्या है ,उसका मन कैसे बनता है और उसके प्रति ऐतिहासिक भौतिकतावादी दृष्टिकोण क्या है इसे सिमोन ने पहले अध्याय मे बताया है।
वे लिखती हैं-"औरत पुरुष की तरह एक शरीर ज़रूर है किंतु उसका अपना शरीर कुछ ऐसा है कि जिसपर उसका नियंत्रण नही रहता । वह उसके स्व से अन्य रहता है ।इस स्थिति को वह गर्भवस्था के दौरान और गहराई से महसूस करती है ।" ......" शरीर उसके लिए एक पराई वस्तु और किन्ही अन्य शक्तियो का शिकार लगने लगता है ।....किशोरावस्था से मेनोपॉज़ तक औरत के शरीर मे घटनाएँ घटती रहती हैं, एक नाटक जारी रहता है ।"
अन्या कही जाने वाली स्त्री का शरीर उसके लिए हमेशा से सीमाएँ बाँधता रहा है । लेकिन उससे भी बुरा यह हुआ कि इन सीमाओं को स्त्री की नियति मान उसे पुरुष से निचले दर्जे का मान लिया गया second sex ।इतना ही नही मनोविष्लेषण ने भी कुछ ऐसी ही व्याख्या कर दी। फ्रॉयड कहते है "औरत अपने आप को एक पंगु पुरुष महसूस करती है,क्योकि उसमे पुरुष जननेन्द्रिय का अभाव है...।"{पृ38}
जबकि वे स्वंय पुरुष् की श्रेष्टता के उद्गगम के बारे मे अपना अज्ञान स्वीकार करते हैं।{पृ. 41}
शायद इसी लिए ""स्त्री के किसी भी अतिक्रमण को एडलर जैसे मनोवैज्ञानिक भी एक मर्दाना प्रतिरोध ही कहत हैं ।एडलर के अनुसार पेड पर चढने वाली लडकी लडको की तरह समानता ही दिखाना चाहती है ।ऐडलर यहाँ नही समझना चाहते कि वह लडकी किसी को कुछ नही दिखाना चाहती। चेतन या अचेतन रूप मे उसकी कोई भी ऐसी ख्वाहिश नही है ,जिसमे वह दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहती हो ।उसे पेड पर चढना अच्छा लगता है और वह चढती है ।तस्वीर बनाना ,लिखना या राजनीति मे भाग लेना ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनको वह अपने लिए करती है।इस तथ्य को नकारना और यह कहना कि उसमे पुरुष के प्रति डाह {जलन } है , मानव -इतिहास को गलत करना होगा । """{पृ. 43}
रोचक यह है कि यह मनोविज्ञान भी पुरुषों का ही दिया हुआ है। जिसमे पुरुष तो मानव प्राणी है और स्त्री की परिभाषा नारी के रूप मे है ।
पुरुष की श्रेष्ठता के इस विचार के कारण ही स्त्री की हर गतिविधि पुरुष के संदर्भ मे ही व्याख्यायित होती है । वह जैसे ही सर्वोपरिता की ओर बढती है तो कहा जाता है वह पुरुषों की बराबरी कर रही है । ।
वह नियति द्वारा लगाए गए व्याघात जब जब तोडना चाहती है ,अपने स्वभाव के चलते , उसे स्त्रीत्व का अतिक्रमण कह दिया जाता है।

सिमोन द बोउवार ----मेरी समझ से ---- पहली कडी

कुछ दिनो पहले नोटपेड को एक चिट्ठाकार ने नारद की ' सिमोन द बोउवार ' कहा था तो मन किया क्यो न सिमोन के बारे मे कुछ जानकारी हासिल की जाए। यह तो जग जाहिर है की आज का जो नारीवाद है उसकी नीव मे सिमोन है, तो सोचा की चलो देखे की अंतर्जाल पर वो भी हिन्दी मे सिमोन के बारे मे क्या कुछ लिखा है । पाया कि कुछ भी नही लिखा । 'The Tribune' मे प्रभा खेतान की किताब ' स्त्री : उपेक्षित ' की समिक्षा कीए गई है। यह भी ' The Second Sex ' का हिन्दी रुपांतर है। फिर जैसे तैसे इस किताब का जुगाड किया ओर पढना शुरु किया है । जो पढा सो आप सब के साथ बांटने की कोशिश है।

पूरा नाम : Simone Lucie-Ernestine-Marie Bertrand de Beauvoir

जन्म : पेरिस, फ्रांस , 9 जंवरी 1908

सिबलिंगस : दो छोटी बहने

सीमोन फ्रांस के स्त्री मुक्ति आंदोलन की अगुआ थीं ।1947 मे जब हम राष्ट्र की आज़ादी की खुशी मना रहे थे वे 'दि सेक्ण्ड सेक्स' की रचना कर स्त्री मुक्ति के मोर्चे खोल रहीं थीं ।1970 तक वे स्त्री की स्थिति मे आमूल परिवर्तन की बात करने लगीं।समाजवाद भी स्त्री की समस्या का हल नही कर सकता यहाँ उन्हें रूस की स्त्रियो को देख कर समझ आ गया था ।1974 मे वे स्त्री मुक्ति आंदोलन की प्रेसीडेंट चुनी गयी और अपने प्रियजनो को एक एक कर विद दे अनतत:1986 मे दुनिया से रुख्सत हुईं।सीमोन का अध्ययन मुझे इसलिए भी रोचक लगता है कि यहाँ स्त्री मुक्ति को लेकर पुरुषो का रवैया सामंती ही है। मुक्ति का प्रश्न उठते ही चतुर सामंत की तरह आज का पुरुष तरह तरह की दलीले देकर कि स्त्री तो महान है , वह पुरुष से ज़्यादा सामर्थ्यवान है, वह जीवन का सही उद्देश्य जानती है, वह दैवीय गुण युकत है वगैरह..... , कन्नी काटता है। इससे भी काम ना बने तो छिछोरों की तरह कहने लगते हैं- हटिये, हटिये स्त्रीवादी आयीं,या उसके निजी जीवन मे ताक झाँक बढा देते हैं ।कुछ उसके लेखन मे कामुक आनन्द लेने लगते हैं ।जैसे प्रभा खैतान की आत्मकथा" अन्या से अनन्या" आयी तो लोग उत्सुक होकर लपके उनके डॉक्टर साहब के साथ प्रेम प्रसंग को पढने ।the second sex की भूमिका लिखते हुए डॉ प्रभा खैतान पूछती हैं- क्या शरीर के अलावा औरत की और कोई पूँजी नही है ?सुबह सुनील दीपक का पोस्ट देख कर भी ऐसे प्रश्न सामने आए । शरीर को लेकर हमारे मन इतनी ग्रंथियों मे क्यो जकडे हैं।

चिंतन चालू आहे ......................

मंगलवार, अप्रैल 10, 2007

खेल संख्या का बनाम प्रजातंत्र

प्रजातन्त्र मे हर व्यक्ति मात्र एक नंबर है या एक वोट है ,इसके अलावा उसकी कोई और पहचान नही है ।तो जिसके पास ज़्यादा नम्बर वही राज करेगा, “जिसकी लाठी ,उसकी भैंस”। अगर यह प्रजातन्त्र है तो जंगल राज क्या है?
प्रजातंत्र कि सबसे बडि दिक्कत यह है कि यह समूह की जरुरतो को ज्यादा महत्व देता है एक जीवन की बलि यदि कईयोँ को बचाती है तो , दे दी जानी चहिए।हालाँकि प्रजातंत्र हमेशा ऐसी शासन व्यवस्था के रूप मे प्रोजेक्ट किया जाता रहा जिसमे स्वतंत्रता को हमेशा महत्व मिला है। लेकिन यह स्वतंत्रता किसी व्यक्ति की न होकर हमेशा तंत्र, शासन, संस्था की ही रही है। अंग्रेज़ गाँधी जी को इसलिए फाँसी नही दे सके क्योंकि उनके पीछे उनके सहायको, समर्थकों की भीड थी।लेकिन क्रांती कारी एक के बाद एक सूली पर लटकाए गए । उनके समर्थकों की संख्या गाँधी जी के समर्थको की संख्या से निश्चित रूप से कम थी।
दर्शन दोनो के पास था।
पर व्यवस्था से सीधी टक्कर लेना, उसी की भाषा मे, सज़ा-ए-मौत को बुलावा देना है।
अमरीका और ब्रिटेन, समृद्ध सैन्य बल{संख्या और तकनीक की दृष्टि से}, के कारण ही सद्दाम हुसैन को सूली पर चढा देते है। और यह सब किया गया प्रजातंत्र को बहाल करने के नाम पर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए।
नक्सलपंथी जो व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए संघर्षरत हैं, उन्हे हमारे देश की सरकार्,{ जो बहुमत पर निर्भर होती है }आतंकवादी कहती है ; ठीक वैसे ही जैसे ब्रिटिश सरकार भारतीय गरम दल के सदस्यो को आतंकवादी मानती थी।
आज़ादी के बाद प्रजातंत्र की स्थापना होते ही संख्या की शक्ति का आभास मिल गया और वे समूह जो संख्या मे अधिक थे स्वयंमेव मुख्यधारा बन गए। जबकि छोटे समूह जो अल्पसंख्यक थे वे हाशिए पर पडे रह गए ।और यही से शुउ हुई अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की दरार जिस पर अभी भी मोहल्ला और अन्य कुछ ब्लॉग बहस कर रहे हैं।
कहीं ऐसा तो नही कि हमने प्रजातंत्र को इसलिए चुना कि उससे बेहतर विकल्पहमारे पास नही था या उस युग के नेताओं और प्रभावशाली लोगो ने हमे ऐसा ही बताया । शायद देश के तद्युगीन कर्णधारों को यही अपने हित मे लगा कि व्यापक समूह के कल्याण के नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा जाए क्योंकि सत्ता में रहने वालों के लिए इस दृष्टि से, प्रजातंत्र सर्वोत्तम था।
प्रशासन की यही प्रणाली {प्रजातंत्र} सर्वोत्तम है,ऐसा सोचने को हम बाध्य हो गए और इसके अलावा अन्य विकल्पों के बारे मे सोच को प्रेरित करने वाला वातवरण भी नही बनने दिया गया। आज के माहौल मे प्रजातंत्र हम जैसों{विकासशील देश} के लिए बेस्ट अवेलेबल विकल्प है। हम यहीं तक सोच कर रूक जाते हैं।
मेरा मुद्दा प्रजातंत्र की बुराई करना नही वरन इस सोच के लिए चेतना विकसित करने को लेकर है कि क्या वास्तव में हमारे पास कोई अन्य विकल्प नही बचा? क्या इससे आगे सोच ही नही सकते। यहाँ तक कि न्याय प्रणाली भी सही – गलत का फैसला करते हुए संख्या की शक्ति से प्रभावित होती है।
वोटिंग सिस्टम ने हर बात का फैसला मेजौरिटी के हाथ मे दे दिया है। अत: आपके सत्य के साथ संख्या का बल नही है तो वह सत्य भी झूठ की श्रेणी मे ही है।
क्या यह अल्प्संख्यक –हितों की अवहेलना नही है ।अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ मुस्लिम नही हर वह छोटा समूह या अकेला व्यक्ति है जो एक विशाल बहुसंख्यक वर्ग के सामने खडा है।